सविता वर्मा
ऊटी। नीले रंग का कैनवास है नीलगिरि की बादलों से ढकी पहाड़ियां। इस पर बदलते हुये बहुरंगी लैंडस्केप उकेरे हुए हैं। चाहे कुन्नूर हो या कौत्तागिरि या फिर नीलगिरि। जिले का मुख्यालय ऊटी लगातार बहते हुए लैंडस्कैपों को अपने आगोश में समेटते नजर आता है। एक तरफ जंगली फूलों की सैकड़ों किस्में और दूसरी तरफ चाय बागान के हरित स्तर। और इनकी रखवाली करते नजर आते हैं यूकेलिप्टस और देदार के ऊंचे दरख्त। ऊटी के नार्थ लेक रोड से अगर बोटेनिकल गार्डन की पहाड़ियों पर नजर डालें तो हर पांच-दस मिनट में बदल जाने वाला एक मनोरम दृश्य दिखता है। यह बदलाव लाते हैं यूकेलिप्टस और देवदार की दरख्तों को घेरे हुये बादल। नीलगिरि की पहाड़ियां सिर्फ रंगों की खूबसूरती ही नहीं समेटें हैं, इसमें यूकेलिप्टस (नीलगिरि) की खुशबू भी बसी है, जिसमें यह छोटा सा पहाड़ी शहर डूबा रहता है। कहीं भी जायें, रेले स्टेशन, रेस्तरां, झील या फिर दूर किसी पहाड़ी पर, नीलगिरि की खुशबू साथ नहीं छोड़ती। शहर के भीतर जगह-जगह पर यूकेलिप्टस का तेल निकालने का लघु उद्योग फैला हुआ है जो कहीं-कहीं इसकी खुशबू को असहनीय भी बना देता है। नीलगिरि को आमतौर पर नीला गिरि कहा जता है। यह नाम पहाड़ियों और पेड़-पौधों की सघनता से पैदा होने वाली नीली धुंध की वजह से रखा गया था ऐसा कहा जता है। नाम करीब ८५0 साल पुराना है, पर नीले रंग की चमक आज भी ताज है। ऊटी जिले का मुख्यालय है जो दक्षिण भारत के सबसे खूबसूरत और देश के चन्द अच्छे पहाड़ी शहरों में गिना जता है। इस पहाड़ी शहर को विकसित करने का काम १८१९ में कोयंबतूर के कलेक्टर जॉन सुलिन ने किया था। सबसे पहले १८२३ में यहां झील बनाने का काम शुरू हुआ। प्राकृतिक झरने के पानी को इकट्ठा करके उसे झील में तब्दील करने के काम तीन साल लगे। इस झील का पानी इतना साफ था कि १८७७ तक ऊटी के निवासी इसी को पीने के काम में लाते थे। ऊटी में धनाढ्य पर्यटकों के लिये और मौजूदा पर्यटन संस्कृति के लिहाज से बहुत से आकर्षण हैं। गोल फार रेसकोर्स, घुड़सवारी, उम्दा किस्म के होटल और क्लब, लेकिन ऊटी असली सौन्दर्य खुले हुये पहाड़ी मैदानों, यूकेलिप्टस के जंगलों, चाय बागानों और जंगली फूलों में है। झील, अभ्यारण्य और सीढ़ीनुमा खेतों के हरित स्तर ही ऊटी का असली सौंदर्य हैं। हालांकि यहां पर भी उत्तर भारत की हिल स्टेशन संस्कृति पांव पसारती ज रही है। कश्मीर में पनपे उग्रवाद के चलते दक्षिण की तरफ पर्यटकों का रूझान और बढ़ा है। गर्मियों में ठण्डे पहाड़ी सैरगाहों की सूची में ऊटी का नाम ऊपर है।
गर्मी शुरू होते ही दक्षिण से लेकर पश्चिमी भारत के पर्यटक ऊटी की तरफ रूख करते हैं। जिसके चलते पर्यटकों की भीड़ बढती जा रही है। इस दौरान यहां के मशहूर फ्लार शो को देखने के लिये सभी जगहों के पर्यटक उमड़ पड़ते हैं। यह फ्लार शो ऊटी के बोटेनिकल गार्डन के आकर्षण की मुख्य वजह भी है। हालांकि पर्यटकों की भीड़ से नीलगिरि के प्राकृतिक स्वरूप पर भी असर पड़ रहा है। नीलगिरि की पहाड़िया हिमरेखा में नहीं आतीं, लेकिन गर्मियों में यहां का तापमान दिन में २५ डिग्री सेण्टीग्रेड से ऊपर नहीं जाता और रात में १0 डिग्री तक गिर जाता है। जिसका अंदाज बाहर के पर्यटकों को नहीं होता, क्योंकि हम यह मानकर चलते हैं कि दक्षिण भारत का पहाड़ी सैरगाह होने की वजह से यहां भी गर्मी होगी। जिसके चलते यहां आने के बाद ज्यादातर पर्यटकों को गर्म कपड़े खरीदने पर मजबूर होना पड़ता है। फिर अगर बारिश हो जाये तो तापमान और भी नीचे आ जाता है। ऊटी सुन्दर है तो ऊटी पहुंचने के दोनों रास्ते भी सुन्दर हैं। अगर बंगलूर-मैसूर होते हुये मुधमुलाई अभ्यारण्य के बीच से निकली सड़क के जरिये यहां पहुंचे तो अलग ही अनुभव मिलेगा। एक हजार मीटर की ऊंचाई और सवा तीन सौ वर्ग किलोमीटर में बसे इस अभ्यारण्य में शेर, चीते, भेड़िये, जंगली बिल्ली, बड़ी गिलहरी, हाथी और तरह-तरह के सांप हैं। लेकिन हाथियों का जमावड़ा अक्सर नजर आता है। जो कभी-कभी कार या बस के सामने भी जम जाते हैं। इस अभ्यारण्य के बीच में एक ‘‘एलीफैन्ट कैम्प’’ है जहां पालतू हाथी भी नजर आते हैं। जंगली में नारियल, खजूर और ताड़ के अलावा कई खूबसूरत जंगली पौधे नजर आते हैं। पर दूर तक फैले हुये नारियल और ताड़ की सघनता मोहक है। मिट्टूप्लायम से ऊटी तक माउण्टेन रेल भी चलती है। यहीं से पहाड़ियों की शुरूआत हो जती है। कुन्नूर पहुंचते-पहुंचते हवाओं में ठण्ड और यूकेलिप्टस की खुशबू महसूस होने लगती है। यहीं से दूर तक फैले हुये चाय बागान और आलू गोभी के सीढ़ीदार खेत नजर आने लगते हैं। नीलगिरि की पहाड़ियों में आलू की खेती भी बड़े पैमाने पर होती है। कुन्नूर करीब १३ वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ कस्बा है जिसकी जनसंख्या एक लाख के आसपास है। जो लोग ऊटी की भीड़भाड़ से बचना चाहते हैं वह यहीं रूक जते हैं, क्योंकि यह ऊटी के मुकाबले काफी शान्त है। ऊटी में दर्शनीय स्थलों में मुख्य रूप डोडाबिट्टा, कथाटी झरना, आयेंगे। इनमें बोटेनिकल गार्डन सबसे पुराना है। इसे १९४७ में बनाया गया था। इसमें आज कई दुर्लभ किस्म के फूल-पौधे नजर आते हैं। बोटेनिकल गार्डन मैदान से शुरू होकर पहाड़ी पर खत्म होता है। जिसके बीच-बीच में दुर्लभ पौधों, बहुरंगी फूलों के आला हरी घास का गलीचा दूर तकदिखाई पड़ता है।
मैसूर से ऊटी की सड़क यात्रा भी कभी भूली नहीं जा सकती। सड़क के दोनों तरफ पहाड़ियों के अद्भुत दृश्य नजर आते हैं। दूर तक फैली नीली पहाड़ियां तराशी हुई लगती हैं। इसकी वजह फैले हुये चाय बागान हैं जो पहाड़ियों को एक गोल तराश दे देते हैं। सड़क के दोनों ओर काफी घने पेड़ लगे हैं जो सूरज की रोशनी को सड़क तक नहीं पहुंचने देते। सड़क के दोनों ओर सुन्दर पहाड़िया हैं। ऊटी पहुंचने का दूसरा रास्ता जो कोयंबतूर से है एकदम अलग तरह का है। कोयंबतूर से मिट्टूप्लायम पहुंचते ही ऊटी की पहाड़ियां नजर आने लगती हैं। मैदानी इलाकों में ही कुछ किलोमीटर का रास्ता केरल की हरियाली जैसा है, जो जंगलों के बीच से है।