सच्ची साधना से ही मिलती है कला की संजीवनी: अंजना

27 जून

ग्वालियर। चंबल का जब नाम आता है तो सबसे पहले बीहड़, बागी और बंदूक की तस्वीर उभरती है। डकैतों की दहशत का एक खौफनाक मंजर बनता है, लेकिन इसी चंबल में कला, संगीत और नृत्य की मधुर स्वर लहरियां बिखरती हैं, जो धीरे-धीरे देशभर में और विदेशों में झंकृत होती हैं। कला, संगीत और नृत्य के मार्फत चंबल को एक नया चेहरा दिया है प्रख्यात कथक नृत्यांगना डॉ. अंजना झा ने। उन्होंने साबित किया है कि यह चंबल की माटी कलाजीवी और कला पोषक भी है। भिण्ड की गलियों से निकलकर अंतर्राष्ट्रीय मंच पर छा जाने वाली अंजना झा आज कला की दुनिया में एक जाना पहचाना नाम हैं। वर्तमान में वह राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर एवं डांस डिपार्टमेंट की एचओडी हैं।

डेटलाइन इंडिया से अपनी कला के सफर को साझा करते हुए उन्होंने कहा कि सच्ची लगन से की गई मेहनत कभी जाया नहीं जाती। जो लोग सच्चाई से कला की साधना करते हैं, उन्हें ही कला की संजीवनी प्राप्त होती है। वह कहती हैं कि सच्चे लोगों के साथ हमेशा भगवान होता है, बस आवश्यकता है धैर्य रखने की और अपना काम ईमानदारी से करने की। वह कहती हैं कि कला में कोई शॉर्टकट नहीं होता है। यह गुरुओं के मार्गदर्शन, साधना और अच्छे लोगों की संगत से ही प्राप्त होती है। वह इस बात से कुछ व्यथित हैं कि आजकल के बच्चों में बहुत जल्दी सब कुछ पाने की छटपटाहट होती है।

सरकार के प्रयासों का लाभ उठाना चाहिए

वह कहती हैं कि मध्यप्रदेश सरकार द्वारा कला के लिए जितना धन खर्च किया जा रहा है वह कहीं और नहीं किया जा रहा। कला के प्रति रुचि रखने वाले लोगों को इसका लाभ उठाना चाहिए और आगे बढ़ना चाहिए।

घर में मिला माहौल, पिता ने बढ़ाया आगे

वह बताती हैं कि उन्होंने संगीत और नृत्य के लिए बचपन से कड़ी साधना की। उनका जन्म 1983 में भिण्ड में हुआ। पिता जी अशोक कुमार झा MPEB में इंजीनियर थे और गाने के शौकीन थे, इसलिए घर में संगीत का माहौल था। हर शनिवार को घर में भजन का कार्यक्रम होता था, इसी माहौल ने उनके अंदर भी संगीत के प्रति रुचि पैदा की। संगीत की प्रारंभिक शिक्षा उन्हें अपने पिता से ही मिली। उनके घर कलाकारों का आना जाना था, इन्हीं में थे संगीतकार सुखदेव कुशवाह, उनसे उन्होंने बचपन में संगीत की शिक्षा ग्रहण की। सात-आठ वर्ष की उम्र में वह मंच पर परफोरमेंस देने लगी थीं। भिण्ड में ही सुखदेव कुशवाह ने पिताजी से उन्हें डांस सिखाने को कहा। उसके बाद पिताजी का ग्वालियर ट्रांसफर हो गया। यहां आने पर उन्होंने संगीतकार भूदेव शर्मा जी से संगीत की शिक्षा ग्रहण की।

वृन्दावन में मिले डांस गुरू

डॉ.अंजना बताती हैं कि उनके पिता वृन्दावन जाते थे, वहां उन्होंने दिल्ली से आए राजेन्द्र कुमार गंगानी को डांस करते हुए देखा तो उनका डांस इतना भाया कि उन्होंने उसी समय तय कर लिया कि मुझे उन्हीं से डांस सिखवाएंगे। इसके बाद सन 2000 में पिताजी ने दिल्ली में नेशनल इंस्टीट्यू्ट ऑफ कथक में एडमिशन करवा दिया। यहां उन्होंने कथक गुरू गंगानी जी से तालीम हासिल की और कथक में पोस्ट ग्रेज्युएट डिप्लोमा विद ऑनर्स हासिल किया और फिर इन्द्र कला संगीत विश्वविद्यालय कालीगढ़ से पीएचडी की।

थाईलैंड में किए 80 से भी अधिक प्रोग्राम

डॉ.अंजना झा ने ICCR (इंडियन काउंसिल कल्चर रिलेशन) से जुड़कर दो वर्ष तक थाईलैंड में 80 से अधिक डांस की प्रस्तुतियां दीं। इस दौरान उन्होंने स्टूडेंट्स को कथक भी सिखाया।

अंतर्राष्ट्रीय मंच पर जमाई कथक की धाक

उन्होंने कई देशों में कथक की प्रस्तुतियां देकर अपनी कला का लोहा मनवाया है। उन्होंने थाईलैंड के अलावा अमेरिका, मलेशिया, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया, स्विटजरलैंड, नार्वे, आइसलैंड में प्रोग्राम किए हैं।

अवार्ड

डॉ. अंजना दूरदर्शन की ‘ए’ ग्रेड आर्टिस्ट हैं। उन्हें 2004 में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ कथक केन्द्र देहली में सिल्वर मेडल पदम भूषण पं. बिरजू महाराज द्वारा प्रदान किया गया। इसी वर्ष किरण संगीत समारोह कटनी (मप्र) में नृत्य श्री अवार्ड एवं गोल्ड मेडल प्रदान किया गया। ऑल इंडिया डांस कम्पटीशन धमतरी छत्तीसगढ़ में कथकश्री एवं गोल्ड मेडल प्रदान किया गया। संस्कृति मंत्रालय द्वारा उन्हें स्कॉलरशिप प्रदान की गई। उन्हें ग्वालियर गौरव अवार्ड भी प्रदान किया जा चुका है।

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