बेहद खतरनाक दौर में है दुनिया: राजेश रेड‍्डी

10  सितम्बर

ग्वालियर। प्रख्यात शायर राजेश रेड‍्डी का कहना है कि हम बेहद खतरनाक दौर में जी रहे हैं। पूरी दुनिया में एक अजीब तरह का वातावरण है। दुश्मनी जैसा माहौल बन गया है। समाज में नकारात्मकता हावी हो रही है। एक दूसरे काे शक की नजर से देखा जा रहा है। ऐसा पहले नहीं था। आईटीएम यूनिवर्सिटी, ग्वालियर द्वारा आयाेजित 'इबारत' कार्यक्रम में शिरकत करने आए श्री रेड‍‍्डी यहां 'डेटलाइन इंडिया' से बात कर रहे थे। उन्होंने कहा कि आज अपमान जनक बातें हो रही हैं। एक दूसरे के प्रति आदर, सदभाव कम हुआ है। अब केवल एक दूसरे पर अटैक चल रहा है। समाज में दूरियां बढ़ रही हैं। ऐसा पहले नहीं था। 

 

मेरे दिल के किसी कोने में इक मासूम सा बच्चा

बड़ों की देखकर दुनिया बड़ा होने से डरता है

उनके इस शे'र की चर्चा करने पर वह कहते हैं कि उन्होंने ये शे'र अपने शुरूवाती दौर में करीब 30 साल पहले कहा था, लेकिन ये आज उतना ही प्रासंगिक है। सोशल मीडिया का जिक्र आने पर वह कहते हैं कि ये एक अच्छा माध्यम है, लेकिन इसका भी दुरुपयोग हो रहा है। वहां कोई अगर आप की बात से सहमत नहीं है तो अपमानजनक टिप्पणी करने और गाली तक पर उतर आता है। कविता शाायरी के लिए यह अच्छा माध्यम तो मिला है, लेकिन जितने फायदे हैं, उतने नुकसान भी हैं।

देश में भी हालात ठीक नहीं

देश में असहिष्णुता के सवाल पर वह कहते हैं कि कुछ लोगाें ने कहा कि देश में रहना मुश्किल हो गया है, उनके इस कहने पर जिस तरह का रिएक्शन हुआ, उन्हें देशद्रोही कहा गया। यह खतरनाक है। अगर सामान्य स्थिति होती तो ऐसा रिएक्शन नहीं होता। क्या बिगड़ा है, इसे ठीक करने की जरूरत है।

लेखक के लिए चुनौतियां बढ़ी हैं

इस दौर में लेखक के लिए क्या चुनौतियां हैं? इस सवाल पर वह कहते हैं कि बहुत चुनौतियां बढ़ी हैं। पहले जो समाज था और उस समय के जो लेखक थे, उनके लिए उतनी चुनौतियां नहीं थीं, जितनी कि आज हैं। आज पाठक के पास, श्रोता के पास टाइम स्पेंड करने के लिए तमाम वैरायटियां हैं, हमें उसमें से अपने लिए टाइम चुराना हैं। गालिब का जमाना फुरसत का जमाना था, अब हमें फुरसत का समय निकालना है। समय बहुत तेजी से भाग रहा है। अब हमें अपना काम करते हुए उसे रजिस्टर्ड भी कराना है।

बाजार ने गिराया स्तर

बाजार का साहित्य पर क्या प्रभाव पड़ा है? इस पर शायर राजेश रेड‍्डी कहते हैं कि बाजार ने पूरी जिन्दगी को प्रभावित किया है। लेखक भी इस समाज का हिस्सा है, वह समाज में जो देखता है वह लिखता है। बाजार के कारण साहित्य में भी बहुत ज्यादा गिरावट आई है। मंच पर अब जो जितनी हल्की बात करके जितनी ज्यादा तालियां बटौर लेता है, वह उतना ही हिट हो जाता है। आईटीएम यूनिवर्सिटी द्वारा आयोजित इबारत कार्यक्रम की तारीफ करते हुए वह कहते हैं कि जहां केवल साहित्य की बात हो, अच्छा सुनने वाले हों, ऐसे इबारत जैसे कार्यक्रम आजकल बहुत कम होते हैं।

अब ओढ़ना बिछाना हो गई है ग़ज़ल

एक सवाल के जवाब में वह बताते हैं कि उन्हें कॉलेज टाइम से ही कविता में दिलचस्पी हो गई थी। शुरूवात हिन्दी मंचों से हुई। पहले वे गीत लिखते थे, फिर ग़ज़ल का जादू सिर चढ़कर बोलने लगा। वह कहते हैं कि अब ग़ज़ल ने मुझ पर कब्जा कर लिया है। अब तो ग़ज़ल उनका पहनना, ओढ़ना, बिछाना हो गई है।

गीत की अपनीं सीमाएं हैं, शेर की खूबियां हैं

गीत लिखना क्यों छोड़ा?इस सवाल पर वह कहते हैं कि ग़ज़ल में एक जादू है, उसके दो मिसरों में बहुत कुछ कहा जा सकता है। सुनने वाले भी उसे बेहतर ढंग से सुनते हैं। गीत की अपनी सीमाएं हैं और शेर की अपनी खूबियां हैं। यह हमारे लिए वरदान है।

साहित्य से समाज नहीं सुधरता

एक सवाल के जवाब में राजेश रेड‍्डी कहते हैं कि कविता, शायरी अपने को अभिव्यक्त करने का माध्यम है। उससे समाज नहीं सुधरता। समाज तो जहां था वहीं है। लोग सुनते हैं, लेकिन फॉलो नहीं करते।

 

 

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