इबारत: धर्म बूढ़े हो गये हैं मजहब पुराने हो गये

11  सितम्बर

10  सितम्बर

ग्वालियर। आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर  द्वारा सैयद हैदर रजा की स्मृति में आयोजित ‘इबारत-8’ में शायरी के मुखतलिफ अंदाज नजर देखने को मिले। इसके मार्फत प्यार, मुहब्बत और जिन्दगी के अलग-अलग रंगों के साथ देश दुनिया के हालात का भी जिक्र हुआ। इस अदबी महफिल में उर्दू-हिन्दी कविता की गंगो-जमुनी तहज़ीब देखने को मिली। जहां देश के नामचीन शायर डा.राहत इंदौरी, राजेश रेड‍्डी, अकील नोमानी थे तो युवा और नई उमंग के शायर विकास शर्मा राज भी थे, वहीं इस महफिल में विशुद्ध हिन्दी कविता की नुमाइंदगी करने वाले कवि डॉ.उदयन वाजपेयी थे। हिन्दी उर्दू कविता से सजी ये महफिल सुनने वालों के दिलो दिमाग पर छाप छोड़ गई। कार्यक्रम का संचालन शायर मदन मोहन दानिश ने किया।

 

इंदौर से आये डॉ.राहत इंदौरी अपने चिरपरिचित अंदाज में मौजूद थे। उन्होंने जिन्दगी को अलग अलग ढंग से शेरों में आवाज दी। अपनी उम्रदराजी पर उन्होंने कहा-

खुश्क दरियाओं में हल्की सी रवानी और है

रेत के नीचे अभी थोड़ा सा पानी और है

जो भी मिलता है उसे अपना समझ लेता हूं मैं

ये इक बीमारी मुझे खानदानी और है

 धर्म बूढ़े हो गये हैं मजहब पुराने हो गये

ये तमाशा गर तेरे करतब पुराने हो गये

आंखें मूंदे तय किया बचपन से अब तक का सफर

क्या पता हम कब नये थे कब पुराने हो गये

आजकल छुट‍्टी के दिन भी घर पड़े रहते हैं हम

शाम साहिल तुम समंदर सब पुराने हो गये

उसी पड़ाव उसी शामियाने वाले हैं

नया शज़र है मगर फल पुराने वाले हैं

हम अब मकान में ताला लगाने वाले हैं

पता चला है कि मेहमान आने वाले हैं

हर सू फलक मंज़र खड़े हैं

न जाने किसके पैरों पर खड़े हैं

तुला है धूप बरसाने पे सूरज

शजर भी छतरियां लेकर खड़े हैं

इन्हें नामों से मैं पहचानता हूं

मेरे दुश्मन मेरे अंदर खड़े हैं

 

उन्होंने कई ऐसे शेर भी पढ़े जो असीम गहराई लिए हुए थे, इन्हें सुनने वालों ने खास पसंद किया-

उजाला सा है एक कमरे के अंदर

जमीनों-आसमां बाहर खड़े हैं

तेरी हर बात मुहब्बत में गवारा करके

दिल के बाजार में बैठे हैं खसारा करके

मैं वो दरिया हूं कि हर बूंद भंवर है जिसकी

तुमने अच्छा ही किया मुझसे किनारा करके

चलते फिरते हुए मेहताब दिखाएंगे तुम्हें

हमसे मिलना कभी पंजाब दिखाएंगे तुम्हें

चांद हर छत पे है सूरज है हर एक आंगन में

नींद से जागो तो कुछ ख्वाब दिखाएंगे तुम्हें

 

मेरा जमीर मेरा ऐतबार बोलता है

मेरी जुबान से परबरदिगार बोलता है

उसे कुछ और काम याद ही नहीं शायद

मगर वो झूठ बहुत शानदार बोलता है

खुदा ने उसके लवों पर मिठास घोल दी है

वो बोलता है तो जैसे सितार बोलता है

ये सारे शहर में दहशत सी क्यूं है: रेड‍्डी

 

मुंबई से आये नामचीन शायर राजेश रेड‍्डी ने दुनिया के हालातों पर चिंता के साथ कई शेर पढ़े। आज के हिन्दुस्तान की तस्वीर उन्होंने अपने कलाम से इस तरह पेश की-

 

शाम को जिस वक्त खाली हाथ घर जाता हूं मैं

मुस्कुरा देते हैं बच्चे और मर जाता हूं मैं

यूं देखिये तो आंधी में बस एक शज़र गया

लेकिन न जाने कितने परिन्दों का घर गया

जैसे गलत पते पर चला आये कोई शख्स

ऐसे सुख मेरे घर रुका और गुजर गया

 

ये शेर आज की दुनिया के हालात को बयां कर गया-

ये सारे शहर में दहशत सी क्यूं है

यकीनन कल कोई त्यौहार होगा

किसी दिन जिन्दगानी में करिश्मा क्यों नहीं होता

मैं हर दिन जाग तो जाता हूं जिन्दा क्यों नहीं होता

शर्मिन्दा अपनी जेब को करता नहीं हूं मैं

बाजारे आबरू से गुज़रता नहीं हूं मैं

पहचान भी न पाऊं खुद अपने अक्स को

इतना भी आईने में संवरता नहीं हूं मैं

ये मौत कम ही रहता मैं अपने आप में

ऐसा न हो तू आये और मैं मिलूं नहीं

मेरी ग़ज़ल में किसी बेवफा का जिक्र न था

 न जाने कैसे तेरा तश्करा निकल आया

दुनिया अगर चलानी थी मेरे बगैर ही

तो आसमां से मुझको उतारा क्यूं

लिखा नहीं था जब वो हमारे नसीब में

याद उसकी बन गई हैं मुकद‍्दर हमारा क्यूं

दुश्मनों की खुद व खुद हो जायेगी तादाद कम

यारो की फेहरिश्त में कुछहै यार कम कर लीजिये

तरन्नुम में उन्होंने शानदार ग़ज़ल पेश की , देखें

अब क्या बतायें टूटे हैं कितने कहां से हमें

खुद को समेटते हैं यहां से वहां से हम

क्या जानें किस जहां में मिलेगा हमें सुकूं

नाराज हैं जमीं से खफा आसमां से हम

मिलते नहीं हैं अपनी कहानी में हम कहीं

गायब हुए हैं जब से तेरी दास्तां से हम

गम बिक रहे थे मेले में खुशियों के नाम पर

मायूस होकर लौटे हैं हर इक दुकां से हम

रंग मौसम का हरा था पहले

पेड़ ये कितना घना था पहले

मैंने तो बाद में तोड़ा था उसे

आईना मुझपे हंसा था पहले

जो नया है वो पुराना होगा

जो पुराना है नया था पहले

बाद में मैंने बुलंदी को छुआ

अपनी नज़रों से गिरा था पहले

 

ग़ज़ल से हमने काम मगर बेहतरीन लिये : नोमानी

 

बरेली से आये शायर अकील नोमानी ने मुहब्बत से लबरजे एक से एक शेर सुनाये और महफिल में रूमानियत भर दी। देखें उनके शेर-

मुजरिमे इश्क हूं, जंजीर से डरना कैसा

ख्वाब देखा है तो ताबीर से डरना कैसा

मज़ा है कैद में लेकिन रिहा होना पड़ेगा

तुझे ये जिन्दगी आखिर फ़ना होना पड़ेगा

अभी तक हूं इस दीवारो दर में कुछ नहीं बदला

अलावा उम्र के मुद‍्दत से घर में कुछ नहीं बदला

कहीं दिलों को संवारा कहीं दिमागों को

ग़ज़ल से हमने काम मगर बेहतरीन लिये

मगर वो एक सितारा नजर नहीं आता

खड़े हैं कई शख्स छत पे दुरबीन लिये

हाकिमें शहर किसी बात पे क्यों गौर करे

उसकी मर्जी है जिसे चाहे ठौर करे

सवाल था इस तरफ अना का, बकार का मसला उधर था

न घर से खाना खराब पहुंचे, न घर से आली जनाब निकले

 

कार्यक्रम का संचालन कर रहे शहर के शायर मदन मोहन दानिश ने-आरंभ में कई शेर पढ़कर महफिल में शायरी के रंग भरे-

इस अंधी दौड़ में आगे बढ‍़ने की खातिर

तुमने जिसे मिटाया था वही लकीर हैं हम

बस एक चराग के बुझने से बुझ गए खुद भी

तुम आंधियों को परेशान क्यों नहीं करते

उन्होंने सहित  कई उम्दा शेर सुनाकर माहौल को गरमाहट दी और कविता की गंभीरता से शायरी की तरफ मोड़ दिया।

उन्होंने सबसे पहले दावत दी सोनीपत से आये डॉ. विकास शर्मा राज को।

 

विकास शर्मा राज ने एक के बाद एक कई ग़ज़लें सुनाईं। उन्होंने जिन्दगी की जद‍्दोजहद को अपने शेरों में बयां किया।

हवा के वार पे अब वार करने वाला है

चराग बुझने से इंकार करने वाला है

खुदा करे तेरा अज्म बरकरार रहे

जमाना राह में दीवार करने वाला है

जमीन बेचकर खुश हो रहे हो तुम जिसको

वो सारे काम बाजार करने वाला है

इतना मशरूफ हूं आराम नहीं आ सकता

कोई इतवार मेरे काम नहीं आ सकता

हवा के साथ यारी हो गई है

दिये की उम्र लंबी हो गई है

फकत जंजीर बदली जा रही थी

मैं समझा था रिहाई हो गई है

हमारे दरमियां जो उठ रही थी

वो इक दीवार पूरी हो गई है

करीब आ तो गया है चांद मेरे

मगर हर चीज धुंधली हो गई है

मैं तो किसी जुलूस में गया नहीं

मेरा मकान क्यों जला दिया गया

नींद टूटी तो मुझको चैन पड़ा

ख्वाब देखा था अपने मरने का

हमने शब्दों काे कलुषित कर दिया है: वाजपेयी

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इबारत के आरंभ में भोपाल से आये हिन्दी के प्रख्यात कवि डॉ.उदयन वाजपेयी ने कविता में भारतीय विषय पर विवेचन करते हुए कहा कि आज के दौर में शब्दों का इस्तेमाल बड़ा खतरनाक हो गया है। आप के किसी शब्द का इस्तेमाल करते ही आप एक तरह की राजनीति से जुड़ जाते हैं। हमने सारे शब्दों को इतना कलुषित कर दिया है कि अब उन्हें साफ करने की जरूरत है। कविता कवि के स्वातंत्र का क्षेत्र है। वह अपने स्वातंत्र को चरितार्थ करता है। इसलिए यह उस कवि का अपना काम है कि वह भारतीयता को कैसे समझे। पहले वह यह जाने ले फिर कविता लिखे। भारतीयता का अर्थ भारत तक सीमित नहीं है, यह एक व्यापक अवधारणा है। अफगानिस्तान में बेदिल साहब की ग़ज़लें गाने की एक शैली विकसित हुई है। भारतीयता को एक फ्रेम में बांधना असंभव है। उन्होंने कहा कि ऐसी कोई बड़ी कविता दुनिया में नहीं लिखी गई जो अपनी सभ्यता से संवाद नहीं करती हो। उन्होंने कहा कि भारत में यही स्वीकृत बात है कि कोई बात स्वीकृत नहीं है। हम सत्यानवेषी देश रहे हैं। भारत में कवि को ज्ञान का विरोधी नहीं माना गया। भारत में कवि पूरा समझदार और पूरा नासमझ होता है। भारत से यह परंपरा जापान तक गई है कि उसमें पूरा ज्ञान होगा और ज्ञान को अस्वीकार करने की क्षमता होगी।

कार्यक्रम के आरंभ में सभी मेहमान शायरों ने शमां रोशन की। तत्पश्चात सीईओ साडा तरूण भटनागर ने राहत इंदौरी का स्वागत किया। डॉ.जेएस छावड़ा ने डा.उदयन वाजपेयी का , कथाकार महेश कटारे ने राजेश रेड‍्डी का, रश्मि सबा ने अकील नोमानी का , सुरेश तोमर ने विकास शर्मा का, पारितोष मालवीय ने मदन मोहन दानिश का स्वागत किया।

 

 

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