काश...कोई कह दे कि नगालैंड वाली खबर झूठी है

22 जून

ताक़ि सनद रहे

@डॉ राकेश पाठक

प्रधान संपादक , डेटलाइन इंडिया

क्या नगालैंड का अलग झंडा होगा...? क्या नगालैंड में अलग पासपोर्ट बनेगा...? क्या नगालेंड का अलग संविधान होगा...? क्या भारत सरकार ने नगा विद्रोहियों के साथ समझौते में ये शर्तें मान लीं हैं...? अगर हाँ तो मामला बहुत गंभीर है ..!

दो दिन से ये खबरें देश के माथे पर चिंता की लकीरें गहरी कर रहीं हैं। लेकिन दिल्ली मौन है। तो क्या सचमुच 'योग' की चटाई पर लोटपोट हो रही सरकार एक सूबा के 'वियोग' को कालीन के नीचे छुपा रही है ? तो फिर कुछ बोलती क्यों नहीं सरकार..?

काश.. कोई कह दे कि नगा लेंड वाली खबर झूठी है...काश...!

पिछले बरस इन्हीं दिनों दिल्ली से कोहिमा के बीच तेज़ी से तार जुड़े थे। नगा विद्रोहियों की सबसे बड़े संगठन NSCN इसाक-मुईबा ग्रुप (नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ़ नगालिम) के नेता 7 रेसकोर्स पर प्रधानमंत्री के साथ चाय पी रहे थे। प्रधानमंत्री ने खुद ट्वीट किया था कि 'देश के लिए खुशखबरी मिलने वाली है।'

लेकिन देश को अधिकृत रूप से कभी नहीं बताया गया कि नगा विद्रोहियों से क्या समझौता हुआ है। न प्रधानमन्त्री ने दुबारा ट्वीट किया कि क्या खुशखबरी है, न गृह मंत्रालय ने मुंह खोला।

हाँ यह खबर ज़रूर है कि इस समझौते में गृह मंत्री और आई बी चीफ तक हाशिये पर ही रहे। पूरी तरह अँधेरे में।

अब जब साल भर बाद पूर्वोत्तर के अखबारों में खबरें छपीं कि नगालैंड का अलग झंडा और पासपोर्ट होगा तो बवाल मचा। लेकिन हैरत की बात है सरकार अब भी मौन है। 'एक विधान एक निशान' का नारा लगाने वाली पार्टी और सरकार कोई जवाब क्यों नहीं देती..?

क्या पं श्याम प्रसाद मुखर्जी का बलिदान व्यर्थ चला गया..?

क्या महाभारत के धनुर्धर अर्जुन की पत्नियों 'उलुपि' और 'इरावती' के नगालैंड को दूसरा देश मानना पड़ेगा...?

जो भी समझौता हुआ है उसे तफ़सील से देश को बताते क्यों नहीं .? आपको क्या लगता है ...ऊंट की चोरी न्योहरे न्योहरे कर ले जायेंगे आप...?

!! चौड़े में हुए मिज़ो और पंजाब समझौते

देश के इतिहास में अलगाववादी ताकतों से पहले भी समझौते हुए हैं लेकिन ऐसी पर्दादारी कभी नहीं हुयी।

'देश के घर में नाखुश मिज़ो' कहने वाले ललदेंगा के साथ राजीव गांधी सरकार का समझौता (30 जून 1986) इतिहास में दर्ज़ है। ये समझौता सीना तान कर सबके सामने हुआ था।

इससे पहले उग्रवाद की आग में झुलसते पंजाब को थामने के लिए राजीव गांधी सरकार और संत हरचरण सिंह लोंगोवाल के बीच 26 जुलाई 1985 को समझौता हुआ था। इतिहास गवाह है कि इस समझौते ने ही पंजाब को बचाया है।

और ये समझौता भी दुनिया के सामने हुआ।

आज नगा विद्रोहियों से गुपचुप समझौते पर जिस तरह के सवाल उठ रहे हैं वैसे तब नहीं उठे थे, क्योंकि देश सब कुछ जानता था।

बल्कि राजीव गांधी की सफलता की कहानियों में सबसे ज्यादा तारीफ जिन मुद्दों को मिली उनमें पंजाब और मिज़ो समझौते गर्व के साथ शामिल किये जाते हैं।

विडम्बना यह है कि देशभक्ति के स्वयंभू लम्बरदार खामोश हैं...अखंड भारत का सपना देखने दिखाने वाले बाज़ीगर अपनी डुगडुगी लेकर बिलों में मसट्ट मार कर बैठे हैं...चंद नारों को देश की अस्मिता पर खतरा बताने वाले गुमशुदा हैं...

तो क्या 'देश के भीतर देश' बन जाने की खबर पर हम भी सत्तू की तरह घोल कर पी जाएँ... सवाल न पूछें कि सच क्या है....?

अरे कुछ बोलते क्यों नहीं हो....!!!

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