भोपाल। मप्र में इन दिनों सीएम शिवराज सिंह का दलित प्रेम और उससे उपजा ब्राह्मण विरोध सुर्खियों में है। यह पहली दफा है जब ब्राह्मण समाज मप्र सरकार की गलत नीतियों के लिए आंदोलित हो उठा है। हालांकि दूसरी तरफ ये बात भी सच है कि शिवराज सिंह से लाभान्वित होने वा

25 जून

बीते दिनों तीन बार तलाक कह कर विवाह सम्बंध खत्म करने की व्यवस्था के खिलाफ देश की पचास हजार मुस्लिम महिलाओं ने राष्ट्रीय महिला आयोग को पत्र लिख कर एक नया इतिहास बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। इसकी जितनी भी प्रशंसा की जाये वह कम है। दरअसल किसी भी आंदोलन के लिए 50 हजार समर्थकों की तादाद जुटा पाना बहुत बड़ी बात है। वह बात दीगर है कि कुछ मुस्लिम धर्मगुरू इसका विरोध कर रहे हैं क्योंकि वह तीन तलाक को अल्लाह के कानून का हिस्सा मानते हैं। गौरतलब है कि उत्तराखण्ड की शायरा बानू ने तीन बार तलाक कहकर तुरंत तलाक देने की इस व्यवस्था के खिलाफ देश की सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाया है। सायरा बानू ने लिंग और धर्म के आधार पर समानता के अधिकार की मांग की है। भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की ओर से राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ललिता कुमार मंगलम को दिये गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना, ओडिसा, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखण्ड, केरल, उत्तर प्रदेश की तकरीब 50 हजार मुस्लिम महिलाओं के हस्ताक्षर युक्त पत्र में कहा गया है कि कुरान में तलाक की ऐसी किसी व्यवस्था का कोई जिक्र नहीं है। इसके मुताबिक मुसलमान महिलाओं को भी संविधान में अधिकार मिले हैं। आंदोलन की अध्यक्ष नूरजहां साफिया नियाज ने कहा है कि यदि कोई कानून न्याय और समानता के सिद्धांत के खिलाफ है तो उस पर तुरंत रोक लगनी चाहिए। उनके अनसार अभी तो यह शुरूआत है, आप देखते जाइये भविष्य में लाखों लोग इस अभियान से जुड़ेंगे और हम अपनी इस लड़ाई में कामयाब होंगे। गौरतलब है कि इसी साल जनवरी माह में मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को परिभाषित करने के लिए जारी संविधान पीठ की सुनवाई के दौरान ही मुंबई हाईकोर्ट ने फैसला दिया था कि तीन बार तलाक शब्द के उच्चारण पर तैयार किए गए तलाकनामे से तलाक वैध नहीं हो जाता। कोर्ट ने कहा था कि तीन बार तलाक शब्द का उच्चारण ही पर्याप्त नहीं है। इसके लिए इससे पहले की शर्तों को पूरा किया जाना जरूरी है।

भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन के इस अभियान को मिल रहा व्यापक सर्मथन इस बात का सबूत है कि मुस्लिम समुदाय के बीच भी एक ऐसा बड़ा वर्ग है जो यह समझता है कि भले इस परंपरा के सामाजिक प्रभाव की क्यों न गहरी पैठ हो लेकिन बदलते दौर में ऐसी चीजें किसी भी समाज को बहुत पीछे ले जाती हैं जिसका नतीजा उस समुदाय की बदहाली के रूप में सामने आता है। यही नहीं वह समुदाय विकास की दौड़ में पिछड़ता ही चला जाता है। इस बारे में उत्तर प्रदेश की पहली महिला काजी हिना जहीर नकवी का कहना है कि असलियत यह है कि इसका भारी दुरुपयोग हो रहा है। इसने मुस्लिम महिलाओं की जिन्दगी को खतरे में डाल दिया है। यह कुरान की आयतों की गलत व्याख्या है। वे इस मामले में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से हस्तक्षेप की मांग करती हैं। प्रेस परिषद के पूर्व अध्यक्ष और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस मार्कण्डेय काटजू का इस संदर्भ में कहना है कि शरिया कानून की वजह से ही मुसलमानों में पिछड़ापन है। आज समान नागरिक संहिता लागू किए जाने की जरूरत है। वे तीन बार तलाक कह कर निकाह तोड़ने की सख्त मुखालफत करते हैं। इस्लाम और महिला मुद्दों पर अपनी बेबाक राय के लिए विख्यात लेखिका शीबा असलम फहमी के अनुसार ट्र्पिल तलाक तो गैर इस्लामी है। धर्म के नाम पर ये मुल्लाओं की दादागीरी है। ये कुरान के मुताबिक नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील और पूर्व केन्द्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद कहते हैं कि ट्र्पिल तलाक जैसी कोई चीज है ही नहीं। ये सब तब के लिए संभव था जब काजी का इस्लामिक कोर्ट हो। इसे दस लोग तय नहीं कर सकते। वरना यह खाप जैसा होगा।

अंजुमन मिन्हाजे रसूल के प्रमुख मौलाना अथर हुसैन दहलवी कहते हैं कि पैगम्बर के लिए सबसे नापसंद चीज है तलाक। ये इमरजेंसी एग्जिट डोर था और इसे परमानेंट डोर बनाने की कोशिश की गई। इस्लाम में निकाह कान्ट्रेक्ट है, सात जन्मों का बंधन नहीं। कुरान कहती है कि यदि कोई तलाक चाहता है तो पहले काउंसलिंग होगी। लेकिन ये होता नहीं। 2014-15 की एमएचए की रिपोर्ट के मुताबिक सबसे कम तलाक मुसलमानों में हुए, वरना गाली की तरह तलाक का इस्तेमाल किया जा रहा था। मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड के जनरल सेक्रेटरी मौलाना मोहम्मद वली रहमानी कहते हैं कि इस्लामी हुक्म का मतलब सिर्फ कुरान का हुक्म नहीं है। कुरान के साथ टेल्स आॅफ द प्रौफिट भी है। उसे समझना होगा। तलाक का इंस्टीट्यूशन है। उसका एक हिस्सा है ट्र्पिल तलाक। कोई एक तलाक दे तो भी इफेक्टिव है और तीन दे तब भी। ट्रिपल तलाक इस्लाम के हिसाब से क्रिमिनल एक्ट है। किसी ने यदि ट्रिपल तलाक लिया है, तो तलाक तो हो जायेगा लेकिन वो अपराध है। सुप्रीम कोर्ट में इसे जितनी गहराई से देखा जाना चाहिए था वो नहीं किया गया। इसका मुझे अफसोस है। अभी इस पर कोर्ट में बहस होगी। फिर देखा जायेगा कि क्या किया जा सकता है।

भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन के सर्वे की मानें तो 92.2 फीसदी महिलाएं ट्रिपल तलाक के खिलाफ हैं। वे बहुविवाह के खिलाफ हैं। वे अपने पति को किसी भी कीमत में बांटना नहीं चाहतीं। 90 फीसदी औरतों की मांग है कि कानूनी सिस्टम के जरिए काजियों पर नियंत्रण रखा जाये। असल में शरीयत के कानूनों की ठीक तरह से व्याख्या न होने के कारण मुस्लिम पुरुष बिना सोचे-समझे, मनमाने ढंग से अपनी बीबियों को तलाक देते हैं। तलाकशुदा औरत के भविष्य की न तो पति को परवाह होती है और न ही समाज को। उसका कोई पुरसाहाल नहीं होता। मौखिक तलाक को तो पाकिस्तान, बांग्लादेश, इंडोनेशिया, तुर्की, ईराक, ट्यूनीशिया, अल्जीरिया जैसे मुस्लिम देशों में गैरकानूनी घोषित किया जा चुका है। जबकि मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड मौखिक तलाक की जरूरत पर बल देता है। उसके अनुसार असफल विवाह में बने रहने के कारण हत्याएं होती हैं। एकमात्र मुस्लिम धर्म ही ऐसा है जो ऐसी शादी से बाहर निकलने में महिलाओं की राह आसान बनाता है।

यहां सबसे बड़ी संतोष की बात यह है कि इस मामले में जो भी प्रयास किये जा रहे हैं वह मुस्लिम समाज के अन्दर से ही किए जा रहे हैं। इसके लिए खासतौर से मुस्लिम महिलाएं और मुस्लिम महिला संगठन आवाज बुलंद कर रहे हैं। उनके प्रयास का परिणाम है मुस्लिम महिला पर्सनल लाॅ बोर्ड। इसकी अध्यक्ष शाइस्ता अंबर बीते कई सालों से तीन तलाक के कानून को खत्म किए जाने की पुरजोर आवाज उठा रही हैं। उनके प्रयास और मुस्लिम समाज के उदारवादियों का एक बड़ा वर्ग जो इस तरह के कानूनों को बदले जाने का पक्षधर है, उसका कितना असर पूरे मुस्लिम समाज पर पड़ा है या किस सीमा तक ऐसे लोगों के विचार पूरे समाज की मुख्यधारा बन पाने में कामयाब हो सके हैं, इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता। क्योंकि इसमें निहित स्वार्थी कट्टरपंथी तत्वों और राजनीतिक दलों की राजनीति सबसे बड़ी बाधा बनेगी। कारण ऐसे तत्व किसी भी कीमत पर नहीं चाहेंगे कि इस तरह का कोई बदलाव संभव हो। 50 हजार हस्ताक्षर के बाद भी इसकी उम्मीद कम ही है कि मुस्लिम पर्सनल लाॅ में कोई बदलाव हाल-फिलहाल हो पायेगा। हां इतना तय है कि इस लड़ाई से बदलाव की बयार अब मुस्लिम समुदाय में बह चली है। इसे रोक पाना अब आसान नहीं है। जरूरत बदलाव की इस चेतना को विस्तार और नया आधार देने की है। मुस्लिम महिलाओं की समाज सुधार की यह लड़ाई लम्बी चलेगी, इसकी प्रक्रिया बहुत कठिन है, इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता। हां सरकार से इस मामले में कोई उम्मीद करना बेमानी होगा। शाहबानो प्रकरण इसका जीता-जागता प्रमाण है।

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