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आवरण कथा  जुलुम नहीं है सलवा-जुड़ुम उमाशंकर मिश्र : मैं उम्मीद कर रहा था कि कैंप में युद्ध के राहत कैंप की तरह बुरे हालात होंगे. लेकिन वहां पहुंचते ही जो नजारा दिखा वह मेरी धारणा के उलट था.सलवा जुडूम को लेकर जिस तरह का दुष्प्रचार प्रगतिशील वर्ग के स्वघोषित प्रतिनिधि कर रहे हैं, उसे देखकर सवाल उठता है कि उन्हें भी क्या नक्सलियों का समर्थक मान लिया जाय? अभी हाल ही में दंतेवाडा के एक सलवा जुडूम कैंप में जाने का मौका मिला. रायपुर से ही कई मित्रों ने रोका की मत जाओ वंहा हालात ठीक नहीं हैं, ब्लैकाउट है. जनजीवन ठप्प पड़ा है, आदि आदि. फिर भी मैं रायपुर में रहकर कई लोगों से मुलाकात की और बस्तर के हालात के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियां जुटाने में लगा रहा. एक पत्रकार मित्र ने तो यह तक कह दिया की वहां मत जाओ, क्यों जान जोखिम में डालते हो. ऐसे में एक अकेला व्यक्ति जो दिल्ली से रिपोर्टिंग के लिए गया हो उसकी मनोदशा को समझा जा सकता है और वह भी तब जब इस तरह की बात आप ही का मित्र कह रहा हो. फ़िर भी मैंने दंतेवाडा जाने का निश्चय कर लिया था. दो दिन जगदलपुर रहकर स्थिति को करीब से समझा. उस दौरान वंहा बिजली नही थी, क्योंकि नक्सलियों द्वारा टावर उड़ा देने से बस्तर संभाग के चारों जिले अंधेरे में डूबे हुए थे. जगदलपुर में भी कुछ लोगों ने कहा की आप का काम है, हम रोकेंगे नहीं, लेकिन आपको वहां जाने के लिए नही सजेस्ट करेंगे. दंतेवाडा जगदलपुर से करीब १०० किलोमीटर की दूरी पर है. एक मित्र ने तो यह तक कहा की आपको कलेक्टर से कैंप में जाने के लिए इजाजत लेनी पड़ेगी. मन में सवाल उठा की क्या सलवा जुडूम कैंप कोई प्रतिबंधित क्षेत्र है, जो इजाजत लेनी पड़ेगी. लेकिन लोगो का यह कहना कि नक्सली गाड़ियों को निशाना बना रहे हैं. उनका कोई सामाजिक चरित्र नहीं है. मुझे भयभीत तो कर रहे थे, लेकिन मेरा निश्चय दृढ़ था. अंततः दंतेवाडा से करीब ३० किलोमीटर दूर गीदम विकासखंड स्थित कसोली के सलवा जुडूम कैंप की तरफ मैंने कूच कर दिया. रास्ते में मैं सोचता जा रहा था की यह कैसी आजादी है कि आज अपने देश में हम निडर होकर घूम भी नहीं सकते. ऐसे में क्या अर्थ रह जाते हैं हमारी आजदी के. अभी तक के अनुभवों से मुझे रास्ते में ऐसा लगता था कि न जाने पहाड़ी के कौन से कोने से गोली चल जाए. दंतेवाडा पहुँच कर मैंने यह सोचकर कलेक्टर साहब से मुलाकात की कि कैंप तक जाने में कोई समस्या हो तो उसे समझ लिया जाय. लेकिन कलेक्टर एसपी शौरी ने कहा की आप जाइये. किसी तरह की रोकटोक नहीं होती वहां पर. बस चेकपोस्ट पर समान्य पूछताछ की जायेगी. मेरे मन में भी सलवा जुडूम कैंप को लेकर धारणा थी कि बहुत ही बुरे हालत होंगे किसी युद्ध के राहत कैंप की तरह. तम्बू तने होंगे और तम्बुओं के बाहर बैठे बच्चे अपनी माँ से लिपटकर बिलख रहे होंगे. उस महिला ने जवाब दिया की नक्सलियों के डर से कैंप में रह रहे हैं. उसने बताया कि वे लोग (नक्सली) मारते हैं, राशन लूट लेते हैं और उसने यह भी कहा की खाना बनवाते हैं, खाते हैं फ़िर घर की लड़की को उठाकर ले जाते हैं.लेकिन पहली नजर में मैंने जब सलवा जुडूम कैंप देखा तो मेरी वह धारणा टूट गई जिसके वशीभूत मैं यहां तक आया था. कासोली का वह राहत कैंप किसी बसे बसाये गाँव से कम नहीं था. पानी के लिए नल, आंगनवाडी, स्वास्थ्य केन्द्र, शौचालय, उचितदर वाली राशन की दुकान इत्यादि. यही नहीं आदिवासियों को रोज़गार मिल सके इसके लिए हथकरघे भी लगये गए थे लेकिन स्वछन्द प्रवृति के आदिवासी बजाय हथकरघा चलाने के महुआ बीनना ज्यादा पसंद करते हैं. कुछ महिलाओं से बात हुई. वे बात करने से घबरा रही थीं. क्योंकि उनके पास मै बात करने के लिए जाने लगा तो वे बचकर निकल जाना चाहती थी. मैंने उन्हें विश्वास में लिया और बात शुरू की तो उन्होंने बताया की वे आंगनवाडी में बच्चों को पढाती हैं और इसके लिए उन्हें ९४० रूपये महीना मिलता है. जब उनसे पूछा कि घर छोड़कर कैंप में क्यों रहते हो तो एक महिला ने जवाब दिया की नक्सलियों के डर से कैंप में रह रहे हैं. उसने बताया कि वे लोग (नक्सली) मारते हैं, राशन लूट लेते हैं. उसने यह भी कहा कि खाना बनवाते हैं, खाते हैं फ़िर घर की लड़की को उठाकर ले जाते हैं. मन घृणा से भर गया और समझ में आने लगा की भ्रष्टाचार और विकास के आभाव का रोना रोने वाले नक्सलियों को शहरों में भेदभाव और भ्रष्टाचार क्यों नजर नहीं आता. भ्रष्टाचारी नेता उनके निशाने पर क्यों नही आते, आम आदमी का ही खून क्यों बहाया जाता है. सबसे दुखद त्रासदी तो यह है की मानवाधिकार के नाम पर सुरक्षाकर्मियों का विरोध और नक्सलवाद को जस्टिफाई किया जा रहा है. अब तो गाँधी जी की भी छीछालेदर की जाने लगी है. और उन्हें सलवा जुडूम से बाहर निकलने की सलाह दी जा रही है. अगर ऐसा हुआ तो फ़िर असत्य का राज होगा, हिंसाचार होगा और शान्ति की आवाज उठाने वाले निरीह आदिवासियों की चीखें सुनाई दे रही होंगी, और हम बहरे होने का ढोंग करके उन चीखों से बच नहीं सकेंगे.दंतेवाडा़ के सलवा जुडूम कैंप को देखने के बाद मैंने रायपुर की ओर कूच कर दिया। मैं जानना चाहता था कि भारी-भरकम बजट और विदेशी सहयोगियों के सहारे चलनेवालेमानवाधिकार आंदोलनों का जमीनी जुड़ाव क्या है और ऐसा करने के पीछे उनके अपने तर्क क्या हैं? मन में यह सवाल था कि सुरक्षाकर्मी यदि लोगों के मानवाधिकार का हनन कर रहे हैं तो नक्सली क्या कर रहे हैं? रायपुर में रहकर कई तरह की बातें मानवाधिकारवादियों के बारे में सुनने को मिल रही थी। जिनमें से एक था कि मानवाधिकारवादी सलवा जुडूम का विरोध करके नक्सलवाद को जस्टीफाई कर रहे हैं। दूसरी ओर महेंद्र कर्मा तथा डीजीपी विश्वरंजन से जब मुलाकात हुई तो उन्होंने इस तरह की कवायदों को सलवा जुडूम के खिलाफ एक दुष्प्रचार करार दिया। डीजीपी ने तो यहां तक कहा कि दुष्प्रचार करने वालों को यह तय करना होगा कि आप किसके साथ हैं, प्रजातांत्रिक व्यवस्था के साथ या फिर नक्सलवाद के साथ, यदि आप नक्सलवाद के साथ हैं तो आपको इस देश के संविधान के मुताबिक यहां की सुरक्षा एजेंसियों से कोई नहीं बचा पाएगा।
इस तरह उहापोह को लेकर मैंने किसी मानवाधिकार कार्यकर्ता से मिलकर जिज्ञासा शांत करने का निर्णय लिया। रायपुर पहुंचकर मैंने मानवाधिकार कार्यकर्ता सुभाष महापात्र को फोन लगाया तो किसी महिला ने फोन उठाया और कहा कि आप आ जाइये, सुभाष जी अभी घर पर ही मिलेंगे। सवेरे ही मैं ऑटो पकड़ कर सुभाष महापात्र के महावीर नगर स्थित घर की तरफ निकल पड़ा। रास्ते में मैं डीजीपी विश्वरंजन की वह बात बार बार मस्तिष्क में झंझावात उत्पन्न कर रही थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि `नक्सली इस देश का संविधान ही नहीं चाहते हैं।´ फिर नक्सलवादियों के आदर्श माने जाने वाले `माओ´ की बात भी याद आती है कि `सत्ता बंदूक की गोली से निकलती है।´ मन में सवाल उठ रहा था कि क्या नक्सलवाद वास्तव में इस देश के संविधान, प्रजातंत्र के लिए ख़तरा है?यही सब सोचते सोचते मैं महावीर नगर के नाके पर पहुंच गया, मुझे वहां से एमआईजी-22 सहयोग अपार्टमेंट जाना था। पूछने पर पता चला कि सहयोग अपार्टमेंट अभी करीब डेढ़ दो किलोमीटर की दूरी पर है। रिक्शे में बैठकर मैं सहयोग अपार्टमेंट की तरफ चल पड़ा। सहयोग अपार्टमेंट पहुंचकर रिक्शा छोड़कर पैदल ही एमआईजी-22 को खोजना शुरु कर दिया। कई गलियों में ढूंढा, लेकिन जब नहीं मिला तो मैने एक लड़के से पूछा। उस लड़के ने कहा कि `भाई साहब यहां कई लोग आते हैं जो एमआईजी-22 के बारे में पूछते हैं, लेकिन मुझे लगता है कि यह पता ही गलत है।´ उसकी बात सुनकर एक बार तो मैं चकरा गया और संदिग्धता तनिक और बढ़ गई। लेकिन मैं उस गली से बाहर निकल कर आया और नुक्कड़ के एक जनरल स्टोर के मालिक से पता पूछा तो उसने इशारा करते हुए बताया कि उस गली के कोने पर एमआईजी-21 है और एमआईजी-22 भी वहीं होना चाहिए। इतना बताकर उस व्यक्ति के मुंह से सहज ही निकल पड़ा कि वहां तो विदेशी (अंग्रेज) रहते हैं। उसकी बात सुनकर मुझे विश्वास सा हो गया कि हो न हो, वही मेरा गंतव्य स्थान है, क्योंकि अपने देशवासियों के मानवाधिकार की वकालत हम खुद तो कर ही नहीं सकते न, इसके लिए हमें विदेशियों की शरण में जाना ही पड़ता है। वहां जाकर देखा तो एक बड़े से मकान के बाहर बड़ा सा लोहे का गेट लगा हुआ था। गेट पर एक आदिवासी पुरुष लुंगी लपेटे खड़ा था और लुंगी के दूसरे सिरे को घुमाकर उसने कंधे पर रखकर अपने एक हाथ को ढका हुआ था। ध्यान से देखने पर पता चला कि उसका वह हाथ जिसको ढका गया था, इंजर्ड होने के कारण सूजा हुआ था। उस घायल आदिवासी को देखकर यह तो निश्चित हो गया था कि यही मानवाधिकार कार्यकर्ता का घर होना चाहिए। मैंने उस आदमी को बुलाकर दरवाजा खोलने के लिए इशारा किया। पहले तो आदिवासियों की सहज प्रवृत्तिवश वह सकुचाता हुआ सिर झुकाकर दूसरी तरफ चला गया, लेकिन मैंने जब दुबारा बुलाया तो उसने आकर दरवाजा खोल दिया। अंदर घुसते ही दाहिने हाथ पर दरवाजे के बाहर छोटी सी तख्ती लगी हुई थी, जिस पर लिखा था `एफएफएफडीए´ (फोरम फॉर फैक्ट फाइंडिंग डाक्युमेंटेशन एण्ड एडवोकेसी)। यह सुभाष महापात्र द्वारा चलाए जा रहे मानवाधिकार संगठन का नाम है। दरवाजा खोलते ही सामने एक रॉकस्टार की तरह बाल बढ़ाए हुए गोरा विदेशी कम्प्यूटर स्क्रीन पर नजर गड़ाए हुए बैठा हुआ था। मैने उससे सुभाष महापात्र के बारे में पूछा तो इशारा करते हुए उसने अंदर जाने को कहा। उसके भावविहीन चेहरे को देखकर लग रहा था मानो वह भारत में हो रहे इस तथाकथित मानवाधिकार को लेकर बेहद चिंतित हो। अंदर जाने के लिए जैसे ही मैं बढ़ा तो वहीं पर संभवत: दो अन्य विदेशी मानवाधिकारवादी कम्पयूटर पर नजरे गड़ाए ऐसे तल्लीन बैठे थे, मानो वे निरंतर कुछ ट्रैक करने में जुटे हुए थे। उनमें एक महिला थी, जिसने कानों में हैडफोन भी लगाया था। थोड़ा और आगे बढ़ने पर सामने ही कुछ और लोग खड़े दिखाई दिये, जिनमें कई लोग विशुद्ध जनजातीय वेशभूषा में थे, जिन्हें देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता था कि वे आदिवासी हैं। जनअदालत लगाकर नक्सली आदिवासियों को प्रताड़ित करते हैं, बाप को भरी सभा में बेटे से मरवाया जाता है, भरी सभा में लोगों को मार दिया जाता है, आखिर यह भी तो मानवाधिकार हनन के दायरे में आना चाहिए, फिर इस पर कभी चर्चा क्यों नहीं होती? इस बात पर सुभाष सहमती जताते हुए कहते हैं कि नक्सली भी गलत कर रहे हैं। दूसरे ही क्षण वे कहते हैं कि सरकार और नक्सली दोनों ही पक्ष गलत कर रहे हैं। एसपीओ को लेकर विरोध क्यों है, जबकि उसकी भर्ती तो पुलिस एक्ट के तहत की जाती है और वह सरकार के पे-रोल पर काम कर रहा है? जवाब मिलता है कि नाबालिग बच्चों को हथियार थमाया जा रहा है,जबकि संयुक्त राष्ट कन्वेंशन के मुताबिक 14 साल के उम्र वाले को बच्चा माना गया है। मैने पूछा कि हमारे यहां तो 18 साल वाले को ही बालिग माना जाता है, हमें अपने देश का कानून मानना चाहिए या कहीं और का? जवाब में वे कहते हैं कि अपने देश का ही कानून मानना चाहिए, लेकिन जो व्यवस्था गलत है, उसे बदल देना चाहिए।अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब तक आप किसी चीज से अनभिज्ञ हैं तब तक आप समान्य व्यक्ति की तरह बेपरवाह होकर जीवन जी रहे होते हैं, लेकिन जब आप चीजों को समझने लगते हैं तो आप संतोष का अनुभव होता है अथवा निराशा में डूब कर व्यक्ति मानसिक तौर पर अशांत होने लगता है। कुछ ऐसा ही मुझे उन देशी विदेशी मानवाधिकारवादियों और उनके बीच मुंह लटकाये खड़े करीब दर्जन भर आदिवासियों को देखकर महसूस हो रहा था। लेकिन मैंने सहज होने की कोशिश करते हुए पूछा, क्या बात है? सुभाष जी, आप काफी टेन्श दिखाई पड़ रहे हैं। वे बोले हां, अब देखिये न इन लोगों को कोई रात को तीन बजे यहां छोड़कर चला गया और बताया भी नहीं कि ये लोग कौन हैं। सुभाष ने बताया कि उन आदिवासियों में से दो को पुलिस की गोली भी लगी है। यह सुनते ही मेरे मन में सवाल उठा कि क्या ये आम आदिवासी ही हैं, जिन्हें गोली लगी है? संभवत: नक्सली भी हो सकते हैं, क्योंकि दंतेवाड़ा में जिन सुरक्षा बलों पर बाजार में नक्सलियों ने हमला किया था, वे भी तो आम आदिवासियों की ही वेशभूषा में थे. हालांकि यह मेरी तत्कालीन मन:स्थिति की उपज हो सकती है, इसे निर्णायक नहीं माना जाना चाहिए। उनके पूछने पर मैने बताया कि सलवा जुडूम को लेकर मुझे बात करनी है। इतना सुनकर सुभाष महापात्र थोड़ा अचकचाए फिर उन्होंने कहा कि `सलवा जुडूम तो 2005 से पहले ही शुरु हो गया था। पुलिस इसके लिए काफी पहले से ही रिहर्सल कर रही थी और 2003 में बीजेपी सरकार के आने पर ही इसकी शुरुआत हो गई थी। बकौल सुभाष सलवा जुडूम को नेता लोग चला रहे हैं। मैंने पूछा कि आखिर नेता इस आंदोलन को क्यों चला रहे है? जबकि सरकार और यहां तक कि विपक्ष के नेता महेन्द्र कर्मा भी यह कहते हैं कि यह लोगों का स्व-स्फूर्त आंदोलन है। जवाब में वे कहते हैं कि ऐसा सरकार जंगल में कंपनियों के सम्राज्य को खड़ा करने के लिए कर रही है। लोगों को गांवों से निकालकर लाया जा रहा है, जिससे कंपनियों का रास्ता साफ हो सके। लेकिन साथ ही इस ओर भी ध्यान देना होगा कि आदिवासियों के वनक्षेत्र में बसे गांव छोड़ देने से नक्सलियों की ढाल खत्म हो जाएगी। यह भी नक्सलियों के लिए चिंता का एक विषय है। मैनें अगला सवाल पूछते हुए कहा कि महेन्द्र कर्मा, जो इस आंदोलन के नेता है वे तो बाद में इस अभियान से जुड़े थे, जबकि आप कह रहे हैं कि यह नेताओं द्वारा शुरु किया गया है? इस पर वे कहते हैं कि अगर कर्मा बाद में सलवा जुडूम से जुड़े थे तो वे नेता कैसे बन गए। मैनें पूछ लिया कि नक्सलियों का संघर्ष किससे है और किस वर्ग के हित की लड़ाई वे लड़ रहे हैं? सुभाष थोड़ा तिलमिला जाते हैं और कहते हैं कि इसका जवाब देना मेरा काम नहीं है, मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता हूं, यह सवाल आप नक्सलियों से जाकर पूछिये। सुभाष कहते हैं कि जनता ने वोट के रूप में अपनी शक्तियां सरकार को दे दी हैं और सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह जनता की रक्षा करे। मैनें कहा कि सरकार ने सुरक्षा के लिए ही तो सलवा जुडूम कैंपों में सुरक्षा बल तैनात किये हैं। जवाब में वे कहते हैं कि आखिर कैम्प में क्यों आदिवासियों को रखा जा रहा है? क्यों नहीं उन्हें उनके गांव में रहने दिया जाता? मैंने कहा कि यदि सलवा जुडूम शिविरों से सुरक्षा हटा ली जाए तो क्या नक्सली गांव वापस जाने पर उन आदिवासियों को जिन्दा छोड़ेंगे? तब क्या आदिवासियों का मानवाधिकार हनन नहीं होगा? वे कहते हैं कि इस बात की क्या गारंटी है कि शिविरों में रहने पर पुलिसवाले इन लोगों को नहीं मारेंगे, उनका मानवाधिकार हनन नहीं करेंगे? वे कहते हैं कि सरकार और प्रशासन ने इस तरह की परिस्थितियों को पैदा किया हैं। आप आदिवासियों को सुरक्षा नहीं दे पाए, विकास नहीं किया जिसका आक्रोश नक्सलवाद के रूप में उभर कर आता है। वे कहते हैं कि व्यवस्था में भ्रष्टाचार है, इसलिए नक्सली टावर गिरा देते हैं। आप इसकी भी सुरक्षा नहीं कर पाते हैं। जब उनसे पूछा गया कि क्या बिजली का टावर गिराने से बस्तर के करीब 20 लाख लोगों का मानवाधिकार हनन नहीं हुआ? इसका जवाब वे गोलमोल कर जाते हैं और कहते हैं कि इसकी परिस्थितियां सरकार ने ही पैदा की हैं।जब उनसे सवाल किया कि सर्वहारा की वकालत करने वाले नक्सली आखिर उनकी आजीविका के एकमात्र साधन हाट बाजार को क्यों जला देते हैं, उनके गांवों को क्यों जला देते हैं, आंगनबाड़ियों और बाल आश्रमों को क्यों धवस्त कर देते हैं, क्या यह मानवाधिकार हनन नहीं है? सुभाष सीधे तौर पर इसके लिए सलवा जुडूम के नेता महेन्द्र कर्मा पर निशाना साधते हुए कहते हैं कि `गांवों को तो ये नेता लोग जलवा रहे हैं, जिससे आदिवासियों को वहां से बाहर लाया जा सके।´ मैंने पूछा कि दूर दराज के गांवों में बसे करीब 60 हजार आदिवासी किसी नेता के कहने पर क्या इकट्ठा किये जा सकते हैं, जबकि उन्हें यह मालूम हो कि ऐसा करने पर वे नक्सलियों की बंदूक के निशाने पर आ जाएंगे? इस प्रश्न का वे संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाते हैं और कहते हैं कि लोगों को जर्बदस्ती कैंपों में लाया जा रहा है। लेकिन जब यह पूछा जाता है कि पुलिसकर्मी भी तो इस लड़ाई में मर रहा है, क्या उसका और उसके परिवार का कोई मानवाधिकार नहीं है? जवाब मिलता है `नहीं, पुलिस का कोई मानवाधिकार नहीं होता, वह तो ड्यूटी पर होता है, मानवाधिकार तो आम नागरिकों का होता है।" क्या हमें सुभाष महापात्र की बात मान लेनी चाहिए? सुभाष सवाल उठाते हैं कि आपने सलवा जुडूम क्यों शुरु किया? कंधार का उदाहरण देते हुए वे "सेफ पैसेज" की भी बात करते हैं। पुलिस व्यवस्था पर आरोप लगाते हुए वे कहते हैं कि पुलिस भ्रष्ट है, यही कारण था कि नक्सलियों से लड़ने के लिए आए केपीएस गिल भी वापस लौट गए? लेकिन जब उनसे पूछा गया कि केपीएस गिल ने जिस तरह की कार्यवाही पंजाब में की थी, क्या वैसा ही बस्तर में भी हो सकता है? जवाब में सुभाष कहते हैं कि पुलिस को चाहिए की नक्सलियों को गिरफतार करे और कोर्ट में ट्रायल करवाए। अंत में सुभाष कहते हैं कि हो सकता है आप मेरी बातों का संदर्भ बदलकर प्रस्तुत कर दें, क्योंकि अक्सर ऐसा किया जाता है और हम भी ऐसा ही करते हैं। वे कहते हैं कि अगर आप ऐसा करते हैं तो मुझे खण्डन करना पड़ेगा। उस पल मुझे अपने पास टेपरिकार्डर न होने की कमी बेहद खली थी, क्योंकि उनकी इस बात से ऐसा लगा कि संभवत: वे मेरे लिखे को भी गलत ठहरा दें। ख़ैर जो भी हो, इस उठापटक का दुष्परिणाम आखिरकार आम आदिवासियों को ही भुगतना पड़ रहा है।
नक्सलवाद और सलवा जुड़ूम कनक तिवारी
देश के कई हिस्सों में नक्सलवाद विकराल समस्या का रूप धारण कर चुका है. लेकिन क्या बढ़ते नक्सलवाद की समस्या का हल सलवा जुड़ुम है? सलवा जुड़ूम अर्थात शांति मार्च. यह इक्कीसवीं सदी के ताज़ा इतिहास की कई अर्थों में लगभग सबसे बड़ी त्रासदी है। यह पहली बार हुआ है जब `भई गति सांप छछूंदर केरी` नामक लोकोक्ति की कील सरकारी तौर पर जनता की छाती पर ठोकी जा रही है। पहले कभी नहीं हुआ कि जनता और पुलिस एक साथ मिलकर शांति मार्च करें और अपने कारवां में शरीक करने के लिए सरकारी दबाव के चलते गांव के गांव खाली कराए जाएं, जिससे हज़ारों आदिवासी मिलकर नक्सलवादियों के मुकाबले फिदायीन दस्ते में तब्दील होते जाएं। जापानी हाराकिरी आतंकवादियों के लिए आत्मघाती दस्ते गठित करने में मूलमंत्र की तरह काम आ रहा है, लेकिन राजनीतिक घटनाक्रम के इतिहास में सलवा जुड़ूम राज्यतंत्र की खलनायकी का पहला उदाहरण बनकर भविष्य के शासकों को सामूहिक हिंसा के नए आयाम ढूंढ़ने में प्रेरणा देता रहेगा। देश की आदिवासी संस्कृति के शिखर के रूप में विख्यात बस्तर के आदिवासी भाई और बहन एक ऐसे मानव वध-अभियान के शिकार बनते जा रहे हैं जिसमें दोनों ओर से चलने वाली गोलियां या तो छाती पर लगेंगी अथवा पीठ पर। नक्सलवाद हिन्दुस्तान की एक बढ़ती विकराल समस्या है। साठ के दशक में जन्मा नक्सलवाद चारु मजूमदार और कनु सान्याल जैसे विप्लवी धुर वामपंथी माओवादी विचारकों के ज़ेहन से निकलकर महाष्वेता देवी की हजार चौरासी की मां के कथानक तक विस्तृत हुआ है। आज देश के आधे से अधिक राज्यों में तरह तरह का नक्सलवाद कहर बरपा रहा है। घोषित तौर पर वह अब भी सामाजिक-आर्थिक प्रक्रिया में बदलाव का हामी है लेकिन अब उसकी बानगी अलग किस्म की है। वह मूल नक्सलवाद का घटिया संस्करण है। व्यापारियों और उद्योगपतियों से हफ्ता वसूलना, ठेकों में कमीशन खाना और छोटे और मझोले कद के मैदानी सरकारी अफसरों को अपनी हिंसा का शिकार बनाना नक्सलवाद का नया प्रदर्शनकारी चोचला है। वह उन आदिवासियों को बंधक बनाता है जो उसकी विचारधारा में विश्वास नहीं रखते। वह उनसे जिरह करता है और उनका जिबह भी। युवक युवतियां रूमानी उम्र के दोष के कारण उसकी ओर आकिर्षत होते हैं और एक तरह की हिंसक संस्कृति घने जंगलों में जड़ जमाती जा रही है। नक्सलवाद के पास अत्याधुनिक हथियार हैं और वह धीरे धीरे अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद का बगलगीर भी बनाया जा सकता है। आतंकवाद और नक्सलवाद हिंसा पुत्र होने के बावजूद सौतेले भाई हैं, सगे नहीं। आतंकवाद भारतीय संविधान को चुनौती देता है और देश के सार्वभौम हिस्से को अलग राष्ट्र में तब्दील होने की हिमायत और हिमाकत करता है। उसे जनसमर्थन प्राप्त नहीं होता लेकिन वह अलगाववाद की घुट्टी जाति, धर्म और भूगोल की विसंगतियों के कारण पिलाता रहता है। नक्सलवाद इसके विपरीत राज्य व्यवस्था की खामियों के सबसे प्रबल और हिंसक जनप्रतिरोध का मुखौटा लगाकर एक राजनीतिक आंदोलन के रूप में इतिहास से अपनी पहचान मांगता है। इसमें कोई शक नहीं कि अंग्रेजी पद्धति की राज्य व्यवस्था रचने में हमारे पुरखों की यही समझ थी कि अधिकारी और नेता बुनियादी तौर पर ईमानदार तथा जनहित को लेकर प्रतिबद्ध होंगे। स्वातंत्र्योत्तर भारत में इतने अधिक जाहिल, अशिक्षित, भ्रष्ट, फिरकापरस्त और जनविरोधी नेता पैदा हुए कि पूरी शासन व्यवस्था ताश के पत्तों की तरह भरभरा कर गिर गई है। अब तो भीड़ की ओर उछाला गया हर पत्थर भ्रष्ट को ही लगता है। मसलन बस्तर के जंगल, पंजाब, राजस्थान और उत्तरप्रदेश आदि से आए मुस्टंडे ठेकेदारों ने खुलेआम काट लिए। यहां तक कि उनके इशारे पर खुद आदिवासी नेताओं ने मालिक मकबूजा कांड रचकर बस्तर के जंगलों का विनाश कर दिया। कमीशनखोरी के चक्कर में बस्तर में पाइन परियोजना लागू करने का राजनीतिक कुचक्र रचा गया। पुलिस के अधिकारी हर आदिवासी की गाय, बकरी, मुर्गी और मां, बहन, बेटी को अपने शोषण और हवश का शिकार बनाने में मशगूल रहे। चिरौंजी के दाम नमक से सस्ते हो गये। राजस्व अधिकारी आदिवासियों की जमीनें नक्शों पर हड़पकर बड़े ठेकेदारों, उद्योगपतियों और सरकारी अफसरों के खातों में चढ़ाते रहे। भूमिसुधार का दावा करने वाली सरकार सुधार की भूमि से गायब रही। जल, जंगल और जमीन से आदिवासियों को बेदखल किया जाता रहा। गैर आदिवासी आबादी इतनी तेजी से बढ़ी कि कुछ विधानसभा क्षेत्रों को अनारक्षित करने की मांग उठने लगी। शराब नीति की खाल ओढ़कर लठैत और ठेकेदारों के गुर्गे बस्तर की अस्मिता को बिकाऊ अस्मत समझकर उससे खेलते रहे। वे पुश्तैनी आदिवासी अधिकारों को अय्याशी और जुल्म के गुर्गों के बल पर बलात्कृत करते रहे। आरक्षण की नीति से लाभ उठाकर जो मलाईदार आदिवासी नेता सपरिवार पनपे, वे उद्योगपतियों और ठेकेदारों के दरबारी बनकर कोर्निश बजाते रहे। नौकरशाही भारत में स्थायी दलाली के समानांतर बनती गई है। जितनी बड़ी नौकरी उतनी बड़ी और स्थायी दलाली की गारंटी राज्य व्यवस्था में है। बस्तर के अन्य आदिवासी इलाकों की तरह वनोपजों पर आदिवासी का पुश्तैनी नैसर्गिक अधिकार कथित सभ्य कानून बनाकर क्रमश: छीना जाता रहा। घोटुल जैसी ऐतिहासिक और महान मानवीय गरिमा की कुंठारहित परंपरा को हरम की शकल में देखा जाने लगा। आदिवासी कन्याओं की पवित्रता नगरीय श्रेष्ठता के आवरण में बलात्कार का पर्व रचने पर मजबूर होती रही। गर्ज यह कि भारतीय दंड विधान में जितने भी अपराध हो सकते हैं उन सबका समुच्चय बस्तर के कुरुक्षेत्र में आदिवासी अस्तित्व को अपना शिकार बनाता रहा। ऐसा नहीं है कि विश्व की इस श्रेष्ठतम आदिवासी संस्कृति से केवल खलनायकों ने सहकार किया है। गि्रयर्सन, फादर वेरियर एल्विन, नरोन्हा और ब्रम्हदेव शर्मा जैसे अनेक शासक, विचारक और संस्कृतिकर्मी हुए हैं जिन्होंने बस्तर की संस्कृति की पवित्रता को बचाए रखने और अभिवृद्धि करने की पुरजोर कोशिशें की हैं। पाइन परियोजना को खुद इंदिरा गांधी ने रद्द किया। हवाई जहाज के बिगड़ जाने पर बचेली में काफी देर तक रुके प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने आदिवासियों से हमजोली की शक्ल में सार्थक संवाद किया। नारायणपुर के रामकृष्ण मिशन का स्कूल एक संस्था नहीं, सांस्कृतिक घटना है। अनेक छोटे बड़े बुद्धिजीवी हुए हैं जिन्होंने बस्तर को हिन्दुस्तान के विचार के मुख्य जनपथ पर चलाते रहने की कोशिशें की हैं। शानी, मेहरुन्निसा परवेज़, किरीट दोषी, लाला जगदलपुरी, सुंदरलाल त्रिपाठी, बसंत अवस्थी जैसे लेखक और पत्रकार हुए हैं जिन्होंने अपने सीमित साधनों के बावजूद बस्तर की अकूत सेवा की है। सरकारों में सभी विधायक और मंत्री संवेदनहीन नहीं होते हैं, अन्यथा राज्य व्यवस्था पहले ही चरण में चटख जाती है। ऐसे महत्वपूर्ण व्यक्तियों का भी योगदान बस्तर की ध्यानाकर्षण मुहिम को लेकर रहा है। लेकिन बस्तर नायक या नायिका प्रधान जनवादी फिल्म नहीं है। यहां खलनायकी का इतना रिहर्सल हुआ है कि उसे पीठ पर छुरा मारने का विश्वविद्यालय कहा जा सकता है। प्रवीरचंद्र भंजदेव ने ऐसा कुछ नहीं किया था कि उनका पुलिसिया वध किया जाता। अरविंद नेताम ने छठी अनुसूची को लागू करने की मांग में ऐसा कोई गुनाह नहीं किया था कि उन पर हमले किए जाते। ब्रम्हदेव शर्मा ने औद्योगीकरण के बरक्स आदिवासी अधिकारों की यदि वकालत की थी तो उन्हें जूतों की माला पहनाकर सरेआम निर्वस्त्र किया जाकर जगदलपुर की सड़कों पर घुमाने से औद्योगिक फासीवाद का खूंखार |